लेकिन अस्पताल की लाइनें दवा से लंबी होती जा रही हैं।
“आयुष्मान भारत योजना से लाखों लोगों को लाभ मिला है।”

लेकिन ज़मीनी हकीकत ये है कि अस्पताल में स्ट्रेचर नहीं है, डॉक्टर नहीं हैं, दवाई नहीं है।
एक ओर देश डिजिटल हो रहा है, दूसरी ओर गाँवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ताले में बंद मिलते हैं।
शहरों में प्राइवेट अस्पतालों का नेटवर्क चौड़ी हो रही है,
पर आम आदमी की जेब सिकुड़ रही है।
गरीब मरीज की हालत देखकर इलाज से ज़्यादा सवाल किए जाते हैं।
बीमारियों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन इलाज की सुविधा सीमित है।
कभी ऑक्सीजन की कमी, कभी बिस्तरों की लड़ाई, और कभी जांच रिपोर्ट के लिए महीनों की प्रतीक्षा।
